Sunday, 13 August 2017

SURYA GRAHAN ON 21ST AUGUST 2017

सूर्य एक सबसे महत्वपूर्ण आकाशिय पिंड है ।सूर्य सभी ग्रहों की गतियों को नियंत्रित करता हैं।यह हमारे जीवन में बहुत महत्व रखता है।इसके बिना हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते है।
सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल या उसके खिंचाव के कारण पृथ्वी भी सूर्य के चारों ओर घूमती है उसके ही सूर्य के चारों ओर भी घूमता है और चंद्रमा का अपना गुरुत्वाकर्षण बल होता है।जब पृथ्वी और सूर्य के मध्य में चंद्रमा एक सीधी रेखा मे आ जाता है तब सूर्य ग्रहण होता हैं।सूर्य ग्रहण हमेशा अमावस्या को ही होता हैं।उस समय राहू और केतु भी चंद्रमा के निकटतम होते हैं।
सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी 9,29,57,209मील है। क्योंकि पृथ्वी की कक्षा पूर्ण रूप से वृत्ताकार नहीं हैं,बल्कि इसकी कक्षा अंडाकार है ।सूर्य इसके फोकस ( नाभि) पर स्थित हैं।पृथ्वी की सूर्य से कम से कम दूरी 91,400,000 मील है।जितने घंटों तक सूर्य ग्रहण होता हैं और उतने वर्षों तक दुष्प्रभाव सक्रिय होता हैं।ग्रहण का अशुभ प्रभाव उन देशों मे अधिक सक्रिय होता हैं जिन देशों मे यह दिखाई पड़ता है। ग्रहण चर राशियो मे तो  इस का प्रभाव शीघ्र समाप्त हो जाता है, अब की. बार यह ग्रहण स्थिर राशि सिंह राशि में लगेगा इसका दुष्प्रभाव  काफी लम्बे समय तक रहेगा। यदि यह ग्रहण दो स्वभाव वाली राशियों में लगता तो इसका दुष्प्रभाव रुक कर देखा जाता है।
ग्रहण तीन प्रकार के होते है:-
  1.पूर्ण सूर्य ग्रहण (सर्वग्रास)

  2. आंशिक सूर्य ग्रहण (खंड ग्रास)
  3.वतयाकर ग्रहण
  1. पूर्ण सूर्य ग्रहण :- पूर्ण सूर्य ग्रहण मे सूर्य का पूर्ण बिम्ब दिखाई नहीं देता है।चंद्रमा के बिम्ब का कोणीय व्यास 33'31"से 29'22" के बीच रहता है।जिस समय चंद्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी पर होता हैं तो उसका कोणीय  
व्यास 29'22" होता हैं।जब चंद्रमा पृथ्वी के निकटतम होता है उसका कोणीय व्यास 33'31" होता हैं। जिस समय सूर्य पृथ्वी से अधिकतम दूरी पर होता हैं तो उसका कोणीय व्यास31'32" और जब सूर्य पृथ्वी से अधिक निकट होता तो उसका कोणीय व्यास 32'36" होता तो जब चंद्रमा पृथ्वी अधिक निकट हो तो सूर्य पृथ्वी से अधिकतम दूरी पर होता हैं उस समय चंद्रमा का कोणीय व्यास सूर्य के कोणीय व्यास कम हो जाता है तब वास्तविक चंद्रमा पुरी तरह से ढक लेता है तो सूर्य का बिम्ब दिखाई नहीं देता है उस समय सूर्य ग्रहण लगता।
आंशिक सूर्य ग्रहण :-
आंशिक ग्रहण मे सूर्य का कुछ हिस्सा ही चंद्रमा द्वारा ढका दिखाई देगा।इसका अर्थ यह है कि सूर्य एवं चंद्रमा के बिम्ब का केन्द्र,दर्शक के लिए एक सीधी रेखा मे नहीं होगा। दूसरे शब्दों में चंद्रमा ठीक ठाक. राहु और केतु की एक बिंदु पर नही है।दशक चंद्रमा की परचछाया से बाहर है।
वलयाकार ग्रहण:-(Annualar Solar Eclipse)
वलयाकार ग्रहण तब होता हैं जब सूर्य पृथ्वी से अधिकतम निकट होता हैं और चंद्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी पर होता हैं।चंद्रमा का आभासीय व्यास कोणीय सूर्य के व्यास कोणीय से कम होता हैं। चंद्रमा सूर्य को केन्द्र मे ढक पाता है केवल उसके किनारे ही दिखाई देते है।
     

ग्रहण की भूमिका:-
ज्योतिष के अनुसार जब भी किसी देश के संबंध मे ग्रहण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती हैं।ग्रहण से लगने से  छ: मास पूर्व और उसके 6 महीने बाद ही तक उसके अच्छे और बुरे प्रभाव दिखाई देने लग जाते हैं।हमारे खगोल शास्त्रों मे अनुसार  ग्रहण का प्रभाव उन देशों मे अधिक सक्रिय होता हैं जहाँ पर ग्रहण दिखाई पड़ता है। ग्रहण, राहू -केतु अक्ष पर होता है और देश के नेताओं को भी प्रभावित करता है। यदि 15 दिनों मे ग्रहण दिखाई देते है तो देशों के विनाश जैसे कि युद्ध,हत्याये आदि की संभावना अधिक रहती है।मार्च 1914 मे दो ग्रहण 14 दिनों के भीतर ही लगे थे ।ज्योतिष और भूगोल शास्त्रीयों ने प्रथम युद्ध की संभावना की भविष्यवाणी की थी।
वराहमिहिर ने वाराहीसंहिता मे ग्रहणो के -
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प्रभाव मे बतलाया है उनके कुछ प्रमुख प्रभाव 
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नीचे दिए गए हैं:-
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1. यदि सूर्य या चंद्रमा  पाप ग्रह से दृष्ट होते हुए ग्रस्त अवस्था में उदय या अस्त हो तो शरद् मौसम में धन्यों और राजा का नाश होता हैं और ऐसे ही पापी ग्रहों से दृष्ट होते हुए पूर्ण ग्रहण. होता है। देश में अकाल और महामारी होती हैं।
2. यदि एक मास के अंदर सूर्य और चंद्र ग्रहण दोनों ही तो सेना के विद्रह के कारण राजा का नाश होता है और देश में हथियारों से रक्त रंजित युद्ध होता हैं।
3.जिस पक्ष मे चंद्र ग्रहण हो उसी पक्ष में सूर्य ग्रहण हो तो प्रजा मे दर्नय होता हैं।स्त्री और पुरुषों मे परस्पर वैर- विरोध होता है, देशवासियों का व्यवहार अनैतिक और अन्याय पूर्ण होता हैं।
4. सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण एक पक्ष मे हो तो ब्राह्मणगण अनेक यज्ञ करते हैं। उसका फल पा कर जनता को हर्ष होता हैं।

सूर्य  ग्रहण की कुंडली के अनुसार सिंह राशि में है उसके पास चंद्रमा बहुत निकटतम है, उसके साथ राहू ग्रह, बुध ग्रह और केतु, शनि की भी दृष्टि है । चंद्रमा सबसे ज्यादा पीड़ित है। बुध ग्रह । सूर्य मघा नक्षत्र में है । इसके अनुसार प्रत्येक राशि पर पड़ेगा ।अगस्त माह बड़ा महत्वपूर्ण मास हैं। इस मास दो ग्रहण लगे हैं।7 अगस्त 2017 चंद्र ग्रहण भारतवर्ष मे दिखाई दिया था। अब 21 अगस्त 2017 को आंशिक सूर्य ग्रहण लगेगा जो कि भारतवर्ष में दिखाई नहीं देगा ।दुसरे देशों मे दिखाई देगा।
जब सूर्य के सामने चंद्रमा ,पृथ्वी
      In this horoscope, the chart of SOLAR ECLIPTIC ON 21 AUGUST 2017 AT 11.59 P.M.

 उपरोक्त कुंडली पूर्ण सूर्य ग्रहण की तस्वीर है जिस मे दिखलाई देता है कि सूर्य, चंद्रमा दोनों 04 डिग्री 44 अंश पर है ।चंद्रमा पूर्ण रूप से अस्त हो गया है।
यह ग्रहण उत्तरी अमेरिका, कनाडा, ग्रीनलैणड, उ.ध्रुव, मैक्सिक, सेंट्रल अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के उत्तरी भाग दिखाई दे गा।
पश्चिम यूरोप, पूर्व यूरोप, पश्चिम एशिया, अमेरिका आदि मे इस प्रभाव दिखाई देगा।  जहाँ पर पूर्ण मे यह दिखलाई देगा वहाँ शासकों के लिए समस्या पैदा करेगा,प्राकृतिक आपदाओं से हानि हो सकती हैं।
21 अगस्त 2017 को दूसरा सूर्य ग्रहण
दिन सोमवार तिथि सोमवती अमावस भारतवर्ष यह ग्रहण दिखाई नहीं देगा |
आंशिक ग्रहण का आरम्भ रात्रि 9 बजकर 16 मिनट
ग्रहण की कुल अवधि = 5 घण्टे 18 मिनट
सूर्य ग्रहण का पूर्ण समय = 3 धंटे 13 मिनट
ग्रहण का मध्य समय = 11 बजकर 54 मिनट
ग्रहण समाप्त होने का समय दिनांक 22 अगस्त 2017 सुबह 2 - 34 मिनट 
ग्रहण के समय खाना -पीना क्या करे :-
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सूर्य ग्रहण के प्रारंभ होने से  12 घंटे पहले सूतक आरंभ हो जाता हैं। ग्रहण के सूतक काल में खाना-पीना और मैथुन करना वर्जित है। ग्रहणकाल में सोना, मूत्र-पुरीषोतसगर और तैलाभयंग भी निषिद्ध है । बच्चे, वृद्ध,और रोगी पर यह नियम लागू नहीं होता हैं।पक्का हुआ अन्न,कटी हुई सब्जी व फल ग्रहण काल में दूषित हो जाते हैं।उनका प्रयोग अच्छा नहीं होता हैं।तला हुआ भोजन,अन्य खाद्य पदार्थों में  कुशा रख कर देने से ग्रहण मे यह दूषित नही होते है। सूखे खाद्य पदार्थ मे इनका प्रयोग करने अावश्यकता नही है।
ग्रहण की भूमिका:-
ज्योतिष के अनुसार जब भी किसी देश के संबंध मे ग्रहण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती हैं।ग्रहण से लगने से  छ: मास पूर्व और उसके 6 महीने बाद ही तक उसके अच्छे और बुरे प्रभाव दिखाई देने लग जाते हैं।हमारे खगोल शास्त्रों मे अनुसार  ग्रहण का प्रभाव उन देशों मे अधिक सक्रिय होता हैं जहाँ पर ग्रहण दिखाई पड़ता है। ग्रहण, राहू -केतु अक्ष पर होता है और देश के नेताओं को भी प्रभावित करता है। यदि 15 दिनों मे ग्रहण दिखाई देते है तो देशों के विनाश जैसे कि युद्ध,हत्याये आदि की संभावना अधिक रहती है।मार्च 1914 मे दो ग्रहण 14 दिनों के भीतर ही लगे थे ।ज्योतिष और भूगोल शास्त्रीयों ने प्रथम युद्ध की संभावना की भविष्यवाणी की थी।
वराहमिहिर ने वाराहीसंहिता मे ग्रहणो के -
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प्रभाव मे बतलाया है उनके कुछ प्रमुख प्रभाव 
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नीचे दिए गए हैं:-
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1. यदि सूर्य या चंद्रमा  पाप ग्रह से दृष्ट होते हुए ग्रस्त अवस्था में उदय या अस्त हो तो शरद् मौसम में धन्यों और राजा का नाश होता हैं और ऐसे ही पापी ग्रहों से दृष्ट होते हुए पूर्ण ग्रहण. होता है। देश में अकाल और महामारी होती हैं।
2. यदि एक मास के अंदर सूर्य और चंद्र ग्रहण दोनों ही तो सेना के विद्रह के कारण राजा का नाश होता है और देश में हथियारों से रक्त रंजित युद्ध होता हैं।
3.जिस पक्ष मे चंद्र ग्रहण हो उसी पक्ष में सूर्य ग्रहण हो तो प्रजा मे दर्नय होता हैं।स्त्री और पुरुषों मे परस्पर वैर- विरोध होता है, देशवासियों का व्यवहार अनैतिक और अन्याय पूर्ण होता हैं।
4. सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण एक पक्ष मे हो तो ब्राह्मणगण अनेक यज्ञ करते हैं। उसका फल पा कर जनता को हर्ष होता हैं।
 
 

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